जय जिनेन्द्र 🙏
सम्यक् दर्शन, सम्यक् ज्ञान, सम्यक् चारित्र। तीनों मिलकर मोक्षमार्ग हैं; अकेला कोई नहीं।
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Vijay K. Jain, Tattvarthsutra, CC0 1.0. वेबपी में परिवर्तित।
तत्त्वार्थ सूत्र, वह एक ग्रंथ जिसे दोनों जैन परंपराएँ पूर्णतः स्वीकार करती हैं, एक ही पंक्ति से आरंभ होता है जो संपूर्ण मार्ग की परिभाषा है।
सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्राणि मोक्षमार्गः
Samyag-darśana-jñāna-cāritrāṇi mokṣa-mārgaḥ
सम्यक् दर्शन, सम्यक् ज्ञान एवं सम्यक् चारित्र मोक्ष का मार्ग हैं।
पंक्ति ध्यान से पढ़ें तो एक बात उभरती है। 'मार्ग' शब्द एकवचन है। तीन रत्न, एक मार्ग। ये तीन विकल्प नहीं, न क्रम से पूरी की जाने वाली तीन सीढ़ियाँ; ये एक ही अवस्था के तीन पक्ष हैं, और जिस आत्मा में एक यथार्थ रूप से है, उसमें तीनों हैं।
सम्यक् दर्शन का अनुवाद प्रायः 'सम्यक् श्रद्धा' किया जाता है, जो भ्रामक है यदि श्रद्धा का अर्थ बिना प्रमाण की मान्यता समझ लिया जाए। अभिप्राय 'यथार्थ दर्शन' के निकट है: वह क्षण जब आत्मा देह को स्वयं मानना छोड़ देती है और अपने स्वरूप को यथार्थ रूप से देखती है।
यह प्रथम इसलिए है कि यही शेष दो का मूल्य निर्धारित करता है। जिस आत्मा ने यथार्थ नहीं देखा, उसका ज्ञान सूचना मात्र रहता है और उसका आचरण क्रिया मात्र; दोनों में से कोई मोक्ष की ओर गति नहीं करता। जैन शास्त्र इस विषय में स्पष्ट हैं: सम्यक् दर्शन के बिना वही अध्ययन और वही तप निष्फल हैं।
सम्यक् ज्ञान अर्थात जीव और अजीव का वह बोध जो तीन विशिष्ट दोषों से रहित हो: संशय, विपर्यय अर्थात एक को दूसरा समझ लेना, तथा अनध्यवसाय अर्थात निर्णय न कर पाना।
ध्यान दें कि कसौटी मात्रा नहीं है। कोई समस्त शास्त्र पढ़ चुका हो और फिर भी सम्यक् ज्ञान न हो, और अल्प पढ़े को हो सकता है। प्रश्न यह है कि जो जाना गया वह ठीक जाना गया या नहीं, और वह उचित विषय अर्थात आत्मा के विषय में है या नहीं।
सम्यक् चारित्र वह आचरण है जो देखे और जाने हुए के अनुरूप हो। व्यवहार में इसका अर्थ है पंच व्रत, जिन्हें मुनि महाव्रत रूप में पूर्णतः और गृहस्थ अणुव्रत रूप में सीमित रूप में ग्रहण करते हैं, साथ ही इंद्रिय एवं मन का संयम।
पारंपरिक उदाहरण रोगी और औषधि का है। औषधि पर विश्वास श्रद्धा है। कौन सी औषधि और कितनी मात्रा, यह ज्ञान है। उसे वास्तव में लेना आचरण है। तीसरे के बिना कोई दो, रोग को जहाँ का तहाँ छोड़ देते हैं।
इनका क्रम आश्रय का है, प्राप्ति का नहीं। सम्यक् दर्शन प्रथम इसलिए कहा गया कि उसके बिना शेष दो मोक्ष की ओर नहीं गिने जाते, किंतु तीनों साथ उत्पन्न होते हैं और साथ ही गहरे होते हैं।